श्रेष्ठतम चमत्कार कौन सा?

स्वामी विवेकानन्द जी का मद्रास प्रवास

सन् 1893… स्वामी विवेकानन्द जी मद्रास में मन्मथ बाबू के घर पर रुके हुए थे। कुछ दिनों बाद उन्हें अमेरिका जाना था। उसी की तैयारी में वे लगे हुए थे। विदेश की भूमि पर भगवा पताका फहराने के लिए वे अथक प्रयास कर रहे थे।

लेकिन इतिहास साक्षी है कि सत्य की डगर पर चलने वालों की राहें कभी आसान नहीं होतीं। उन्हें कदम-कदम पर परीक्षाओं के झंझावातों का सामना करना पड़ता है। नियति ने स्वामी विवेकानन्द जी के मार्ग में भी ऐसी ही एक परीक्षा का जाल बिछा दिया था।

एक स्वप्न जिसने मन विचलित कर दिया

उन्हीं दिनों स्वामी विवेकानन्द जी को एक स्वप्न आया। उन्होंने देखा कि उनकी माँ की मृत्यु हो गई है।

हालाँकि वे एक संन्यासी थे। वे मोह-माया और आसक्ति से बहुत ऊपर उठ चुके थे। फिर भी, माँ का संबंध ऐसा होता है जो एक संन्यासी के हृदय को भी छू लेता है। यह वही रिश्ता है, जिसे आदिगुरु शंकराचार्य जी ने भी निभाया था।

स्वामी विवेकानन्द जी का मन भी विचलित हो उठा। माँ की ममता मन में हिलोरे लेने लगी। मस्तिष्क मोह के जाल में उलझ गया। उनका अंतःकरण व्याकुल हो उठा।

उन्हें बार-बार अपनी माता का विचार आने लगा। वे सोचने लगे, “मैं इतनी दूर विदेश जा रहा हूँ। यदि पीछे माँ के साथ कोई अनहोनी हो गई तो?”

यही चिंता उन्हें भीतर-ही-भीतर परेशान कर रही थी।

मन्मथ बाबू का सुझाव

इसी बीच मन्मथ बाबू को भी स्वामी विवेकानन्द जी के स्वप्न के बारे में पता चला। साथ ही, उन्हें यह भी ज्ञात हो गया कि स्वामी जी इस कारण बहुत विचलित हैं।

स्वामी जी की चिंता दूर करने के लिए मन्मथ बाबू ने दो काम किए।

सबसे पहले उन्होंने तुरंत कलकत्ता में स्वामी जी की माता के घर तार भेजा। उनका उद्देश्य शीघ्र उनकी माता के स्वास्थ्य की जानकारी प्राप्त करना था।

इसके बाद उन्होंने स्वामी विवेकानन्द जी से आग्रह किया कि वे ‘गोविंद चेट्टी’ नामक व्यक्ति के पास चलें।

गोविंद चेट्टी कौन था?

गोविंद चेट्टी एक तांत्रिक था। वह श्मशान के समीप रहता था। हर समय अपने शरीर पर भभूत लगाए रहता है और तंत्र-मंत्र की साधना भी करता रहता है।

वह आत्माओं को वशीभूत करने के लिए वशीकरण मंत्रों का प्रयोग करता था। लोग यह भी मानते थे कि वह अपनी तांत्रिक शक्तियों से भूत-प्रेतों को नियंत्रित कर सकता है।

इसी कारण मन्मथ बाबू बार-बार स्वामी विवेकानन्द जी से उसके पास चलने का आग्रह कर रहे थे।

गोविंद चेट्टी से पहली मुलाकात

अब चूँकि मन्मथ बाबू स्वामी विवेकानन्द जी का अत्यंत आदर-सत्कार कर रहे थे,

इसलिए स्वामी जी उन्हें मना नहीं कर पाए। अंततः वे उनके साथ गोविंद चेट्टी के पास चले गए।

वहाँ पहुँचकर मन्मथ बाबू उसे पूरी दुविधा बता देने लगे। लेकिन स्वामी विवेकानन्द जी ने उन्हें तुरंत रोक दिया।

वे चेट्टी से बोले,

“आप तो बहुत बड़े तांत्रिक हैं। महान शक्तियों के स्वामी हैं। आपको तंत्रविद्या का पूरा ज्ञान है। यदि ऐसा है, तो अपने तंत्र-ज्ञान से बताइए कि मैं आजकल किस समस्या से जूझ रहा हूँ। मेरे मन की क्या अवस्था है?”

चेट्टी ने क्या बताया?

गोविंद चेट्टी भी कम न था। उसने स्वामी विवेकानन्द जी की मानसिक स्थिति का सटीक वर्णन कर दिया।

साथ ही, उसने यह भी बता दिया कि स्वामी जी शीघ्र ही विदेश यात्रा पर जाने वाले हैं।

वहाँ वे धर्म-पताका फहराने के लिए तत्पर हैं।

अंत में चेट्टी ने कहा,

“आपकी माता बिल्कुल स्वस्थ हैं। आप निश्चिंत होकर विदेश यात्रा पर निकलिए। आपकी माता का बाल भी बाँका नहीं होगा।”

क्या चेट्टी की बात सच निकली?

कुछ ही दिनों बाद कलकत्ता से तार का उत्तर आ गया। उसमें स्वामी विवेकानन्द जी की माता के स्वस्थ होने का समाचार था।

यह देखकर मन्मथ बाबू अत्यंत प्रभावित हो गए। उन्होंने स्वामी जी से कहा,

“तांत्रिक चेट्टी तो सही निकला। वह तो अंतर्यामी है। उसने आपका भविष्य भी सही-सही बता दिया। सचमुच उसके पास भूत-भावी देखने की विद्या है।”

स्वामी विवेकानन्द का उत्तर: सच्चा चमत्कार क्या है?

पहले तो स्वामी विवेकानन्द जी चुपचाप मन्मथ बाबू की बातें सुनते रहे। इसके बाद वे बोले,

“ये सभी तांत्रिक शक्तियाँ और विद्याएँ केवल माया का प्रदर्शन हैं। माया कभी सच्ची नहीं होती। मन्मथ बाबू! माया तो छलावा है। वह खोखली होती है। केवल ईश्वर ही सत्य हैं। परमात्मा ही सद्-चित्त-आनन्द, सच्चिदानन्द हैं। बाकी तो सब झूठ का पसारा है।

हमारे ठाकुर रामकृष्ण परमहंस जी सदा ही ऐसी ऋद्धियों-सिद्धियों की निंदा करते थे। अध्यात्म कभी इन चमत्कारों में उलझने की सलाह नहीं देता।

वास्तव में, वास्तविक धर्म इन निम्न चमत्कारों से ऊपर उठकर केवल एक ही चमत्कार की बात करता है। वह है—आत्म-परिवर्तन।

हम आत्मज्ञान की साधना करें। अपने भीतर परिवर्तन का शंखनाद करें। ब्रह्म का ध्यान करके ईश्वर को प्राप्त करें। अपने मन को बदलें। यही वास्तविक चमत्कार है।

श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश

इसके बाद स्वामी जी आगे बोले,

“इसी संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि भूतों की पूजा करने वाला भूतों को प्राप्त होता है। तंत्र-विद्या और चमत्कारिक शक्तियों को प्रणाम करने वाला तांत्रिकों तथा प्रेतों को प्राप्त होता है।

किन्तु, जो परमात्मा की शाश्वत भक्ति करता है, गुरु-ज्ञान से ईश्वर-दर्शन करता है, ध्यान-साधना करता है और आत्मा पर ध्यान लगाता है, वह परमात्मा को प्राप्त होता है।

अतः, तंत्र-मंत्र, ऋद्धियों-सिद्धियों और व्यर्थ के चमत्कारों में उलझने की आवश्यकता नहीं है। इन्हें अपने जीवन में स्थान मत दो। अपना समय आत्मज्ञान की साधना में लगाओ।

क्योंकि वास्तविक अध्यात्म अपने मैले और अशुद्ध मन को शुद्ध-बुद्ध बनाना है। यही असली चमत्कार है, जो एक पूर्ण गुरु करते हैं।”

अमेरिका की यात्रा

इस प्रकार स्वामी विवेकानन्द जी ने मन्मथ बाबू को विस्तार से समझाया।

तत्पश्चात्, वे अपने नियत कार्यक्रम के अनुसार अमेरिका की यात्रा पर निकल गए। वहाँ उन्होंने भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म का प्रचार किया तथा धर्म-पताका फहराई।

चार वर्ष बाद गोविंद चेट्टी से पुनः भेंट

चार वर्षों बाद अमेरिका में सफलता का डंका बजाकर स्वामी विवेकानन्द जी भारत लौटे।

एक दिन उनकी कुंभकोणम में धर्मसभा आयोजित हुई। उस सभा में गोविंद चेट्टी भी उपस्थित था।

भीड़ के बीच स्वामी जी की दृष्टि उस पर पड़ी। उन्होंने देखा कि वह आज भी तंत्र-मंत्र की साधना में लगा हुआ है। वह पूरे तांत्रिक वैभव में दिखाई दे रहा था। लोग उसके आगे-पीछे घूम रहे थे। उसका बहुत सम्मान भी हो रहा था।

लेकिन तभी स्वामी जी की दृष्टि उसकी आँखों पर गई। वहीं उसकी वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो गई।

इतना सम्मान मिलने के बावजूद उसकी आँखों में गहरी अशांति थी। उसके मन में व्याकुलता साफ दिखाई दे रही थी।

विवेकानन्द जी का मार्मिक प्रश्न

सभा समाप्त होने के बाद स्वामी विवेकानन्द जी मंच से उतरे। तभी उनकी गोविंद चेट्टी से भेंट हुई।

मिलते ही उन्होंने उससे एक मार्मिक प्रश्न पूछा,

“एक बात बताओ, गोविंद चेट्टी! तुमने इतनी शक्तियाँ अर्जित कीं। ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ प्राप्त कीं। लेकिन, क्या इनके माध्यम से तुम्हारा मन कभी ईश्वर की ओर अग्रसर हुआ?

  • क्या इन उपलब्धियों से तुम्हारे मन में ईश्वर के प्रति स्नेह उत्पन्न हुआ?
  • क्या तुम्हें कभी ऐसा अनुभव हुआ कि केवल ईश्वर ही तुम्हारे अपने हैं?
  • क्या कभी तुम्हें उनमें अपनी माँ का स्वरूप दिखाई दिया? क्या उनका
  • स्नेह तुम्हें पिता जैसा अनुभव कराता है?
  • क्या वे तुम्हारे बंधु जैसे प्रतीत होते हैं?
  • क्या तुम्हें कभी यह अनुभूति हुई कि परमात्मा हर पल तुम्हारे साथ हैं?
  • क्या तुम्हें ऐसा लगा कि वे तुम्हें देख रहे हैं, तुम्हारी बातें सुन रहे हैं और तुम्हारी प्रत्येक श्वास में विद्यमान हैं?
  • और क्या कभी ऐसा अनुभव हुआ कि आनन्द के सागर प्रभु तुम्हारे भीतर लहरों के समान हिलोरे ले रहे हैं?

वे तुम्हें देख रहे हैं। तुम्हारी बातें सुन रहे हैं। तुम्हारी प्रत्येक श्वास में विद्यमान हैं।

और क्या कभी ऐसा लगा कि आनन्द के सागर प्रभु तुम्हारे भीतर लहरों के समान हिलोरे ले रहे हैं?”

गोविंद चेट्टी का आत्मबोध

स्वामी विवेकानन्द जी के प्रश्न समाप्त हुए। उधर, गोविंद चेट्टी भी मौन हो गया।

उसके पास किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं था। वह न ‘हाँ’ कह सका और न ‘नहीं’।

अंततः, उसने अपना सिर झुका लिया और फूट-फूटकर रोने लगा।

मानो उसके भीतर की सारी उथल-पुथल आँसुओं के रूप में बाहर आ गई हो।

उसकी रुलाई स्वयं कह रही थी कि वह आज तक ईश्वर तक नहीं पहुँच पाई थी। उसने अध्यात्म को केवल खिलौना समझकर खेला था। वह ऋद्धियों-सिद्धियों के मोह में ही फँसा रहा था।

एक तांत्रिक का ब्रह्मज्ञानी बनना

किन्तु आज स्वामी विवेकानन्द जी ने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया।

इसी कारण वह उनके चरणों में गिर पड़ा।

स्वामी विवेकानन्द जी ने बिना देर किए उसे उठाया और अपने गले से लगा लिया।

गोविंद चेट्टी को एक महापुरुष और पूर्ण गुरु का दिव्य स्पर्श प्राप्त हुआ। उसी क्षण दीक्षा के समय होने वाली शक्तिपात की प्रक्रिया घटित हुई। स्वामी विवेकानन्द जी ने उसे ब्रह्मज्ञान की दीक्षा प्रदान की।

जैसे ही गोविंद चेट्टी की दिव्य दृष्टि उद्घाटित हुई, उसके भीतर प्रकाश का उदय होने लगा।

धीरे-धीरे उसके भीतर की नकारात्मकता और तांत्रिक शक्तियों की कालिमा समाप्त होने लगी। यहाँ तक कि वह मंत्रों का संधान भी भूल गया।

अब उसका रोम-रोम सात्विकता, दिव्यता और ईश्वरीय भाव से भर गया। वह ईश्वर का सच्चा पिपासु बन गया।

फलतः, वह क तांत्रिक ब्रह्मज्ञानी साधक में परिवर्तित हो गया। एक शुष्क हृदय ईश्वरीय बसंत से झूम उठा। इस प्रकार एक पूर्ण गुरु के मार्गदर्शन में यह दिव्य परिवर्तन घटित हुआ।

आज के साधकों के लिए संदेश

पाठकों! यह केवल उस समय की बात नहीं थी। आज भी बहुत से लोग अध्यात्म के नाम पर आडंबर करते हैं।

वे ऋद्धि-सिद्धि और चमत्कारों तक ही सीमित रहते हैं।

इन्हीं खिलौनों को पाने के लिए लोग इस दरबार से उस दरबार तक भटकते रहते हैं।

कोई कहता है, “फलाँ गुरु चमत्कार करते हैं।” कोई कहता है,

“वहाँ मन की मुराद पूरी होती है।” कोई कहता है,

“वह गुरु मन की बात पढ़ लेते हैं।” तो कोई कहता है, “वे भूत-भविष्य बता देते हैं।”

इसी कारण, लोग ऐसी तुच्छ शक्तियों के आकर्षण में इधर-उधर दौड़ते रहते हैं। लेकिन वास्तविक अध्यात्म की खोज नहीं करते।

समाज की इसी स्थिति को व्यक्त करते हुए कबीरदास जी कहते हैं—

साँचे का कोई ग्राहक नाहीं,
झूठे जगत पतीजै जी।
कहे कबीर सुनो भाई साधो,
अंधों को क्या दीजै जी।।

अतः, हर संत और महापुरुष ने हमें यही समझाया है कि अमूल्य निधि ब्रह्मज्ञान है। ईश्वर का दर्शन ही

जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाता है।

इसलिए, हमें चमत्कारों के पीछे नहीं, बल्कि ईश्वर-प्राप्ति और आत्मज्ञान की साधना के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए।

यही वास्तविक अध्यात्म है और यही जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार है।

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