उत्तरमेघ – श्लोक 25-52 (यक्ष का संदेश एवं समापन)
• श्लोक 25 – यक्ष मेघ को अपनी पत्नी को संदेश देने के बारे में बताता है। दिन में व्यस्त होने के
कारण तुम्हारी भाभी को वियोग उतना नहीं सताता होगा, (परंतु) रात्रि में विनोद-रहित तुम्हारी भाभी
के अधिक दुखी होने की आशंका करता हूँ। अतः अर्धरात्रि में उचित निद्रा से विहीन पृथ्वी पर लेटी
हुई पतिव्रता उसको मेरे संदेशों से अत्यधिक सुखी करने के लिए भवन के झरोखे में बैठकर देखो।
• श्लोक 26 – यक्षिणी की विरहावस्था का स्वाभाविक चित्रण किया गया है – मनोव्यथा से क्षीण हुई,
विरह की शय्या पर टेके हुए एक पाँव वाली, मानो पूर्व दिशा के मूल क्षितिज में एक कला मात्र
अवशिष्ट चन्द्रमा की मूर्ति, तथा जो रात्रि मेरे साथ इच्छानुसार रमण-क्रियाओं के द्वारा एक क्षण के
समान व्यतीत की थी, उस पतिव्रता को विरह के कारण लम्बी (असहय) हुई (रात्रि को) गरम
आँसुओं द्वारा बिताती हुई देखो।
• श्लोक 30 – यक्ष अपनी पत्नी को संदेश देने का निर्देश देता है – जिसे यक्ष उसे देखकर कहता है –
उसे मेघ के आने का परिचय देते हुए कहेगा कि ‘प्रिय! मैं प्रियंगु लताओं में तुम्हारे शरीर की,
भयभीत हुई मृगियों की दृष्टि में तुम्हारे चितवन की, चन्द्रमा में तुम्हारे मुख-सौंदर्य की, मयूरों की
पूँछों में तुम्हारे केश-पाश की और नदियों की लहरों में तुम्हारे विलास की कल्पना करता रहता हूँ।’
• श्लोक 31 – यक्ष का संदेश – ‘मैं तुम्हारी सखी के मन को अपने प्रति स्नेह से भरा हुआ जानता हूँ,
इसलिए मैं उसे प्रथम विरह में इस प्रकार (अति दुर्बल) हुई सोचता हूँ। अपने को सौभाग्यशाली
समझने का भाव मुझे मुखर नहीं हो रहा है। हे भाई! मैंने जो कुछ कहा है (वह) शीघ्र ही तुम्हें
प्रत्यक्ष हो जाएगा।’
श्लोक 38
• श्लोक 38 – यक्ष मेघ को कहता है – ‘हे मेघ! उस अर्धरात्रि में प्रिया को उज्जयिनी के ही किसी
भवन की छत पर रात्रि निवास करना। भवनों की छत पर कबूतर रात्रि में रहते हैं। तुम भी उसी
प्रकार भवन की छत पर रात बिताना। जब सूर्योदय हो जाए तब तुम आगे के मार्ग पर प्रस्थान
करना और अधिक विश्राम मत करना क्योंकि जिसने किसी मित्र के हितार्थ कोई कार्य करना स्वीकार
किया है वो ढीला नहीं पड़ सकता।’
• श्लोक 41 – यक्ष का संदेश – ‘हे कोपशीले! प्रियंगु लताओं में (तुम्हारे) शरीर की, भयभीत हुई
हरिणियों की दृष्टि में (तुम्हारे) मुख-कांति की, मयूरों के पलों के समूहों में (तुम्हारे) केशों की (और)
हल्की-हल्की नदियों की तरंगों में (तुम्हारे) भ्रूभंगों की कल्पना करता रहता हूँ। खेद है कि हे कोप
करने वाली! किसी भी एक (वस्तु) में तेरी समानता नहीं है।’
• श्लोक 42 – यक्ष का प्रेम-वर्णन – ‘हे प्रिये! प्रणय में रूठी हुई तुम्हें गेरू के रंग से पत्थर पर चित्रित
कर जैसे ही मैं स्वयं को तेरे चरणों में गिरा हुआ बनाना चाहता हूँ, वैसे ही बार-बार उमड़े हुए
आँसुओं से मेरी दृष्टि लुप्त हो जाती है। निर्दय दैव उस चित्र में भी हम दोनों के मिलने को नहीं
सहता है।’
श्लोक 46
• श्लोक 46 – यक्ष का यक्षिणी को सांत्वना संदेश – ‘हे प्रिये! बहुत विचार करते हुए (मैं) अपने आप
ही अपने को सहारा दिए रहता हूँ। हे सौभाग्यशालिनी! इसलिए तुम भी बहुत अधिक व्याकुल मत
हो । अत्यंत (लगातार) सुख अथवा लगातार दुख किसे प्राप्त होता है? (लोगों की दशा) पहिए के
धार के क्रम से नीचे और ऊपर जाती रहती है।’
• श्लोक 47 – यक्ष का यक्षिणी को संदेश – ‘भगवान् विष्णु के शेषनाग-रूपी शय्या से उठ जाने पर मेरे
शाप का अंत होगा। अतः तू शेष चार महीने आँख मींचकर बिता ले। फिर हम दोनों विरह में विचारी
गई उन-उन अपनी इच्छाओं को ढली हुई शरद् ऋतु की चाँदनी वाली रात्रियों में भोगेंगे।’
श्लोक 52
• श्लोक 52 (अंतिम श्लोक) – यक्ष का मेघ से अंतिम निवेदन – ‘हे मेघ! प्रेम के कारण वह दुःखी है,
इसलिए मेरे प्रति दयाभाव के कारण मुझ अनुचित प्रार्थना करने वाले का यह प्रिय करके वर्षा ऋतु
से बढ़ी हुई शोभा वाले (तुम) इच्छित देशों में विचरण करना और इस प्रकार क्षण भर के लिए भी
तेरा बिजली से वियोग न हो।’