भारत का न्याय अंधा नहीं!
“कानून अंधा है… कानून की आँखों पर पट्टी बँधी हुई है।”
बॉलीवुड की कई फिल्मों में आपने यह संवाद (डायलॉग) सुना होगा।
लेकिन आगे आने वाली फिल्मों में आप यह संवाद नहीं सुन पाएँगे। क्यों? क्योंकि भारत का न्याय अब अंधा नहीं है।
भारत की न्याय की देवी अब ब्रिटिश की औपनिवेशिक (colonial) मानसिकता से मुक्त होकर एक नए स्वरूप में प्रस्तुत हो चुकी हैं। अक्टूबर 2024 में, भारत के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशन में न्याय की देवी (लेडी जस्टिस) की एक नई प्रतिमा का अनावरण किया गया, जिसमें न्याय की देवी की आँखों से पट्टी हटा दी गई है।

जो न्याय की देवी पहले ‘चित्र-क’ जैसी दिखती थीं, अब भारत की वही न्याय की देवी ‘चित्र-ख’ जैसी दिखेंगी!
आप देख सकते हैं कि ‘चित्र-ख’ में न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी नहीं है। आँखों से पट्टी हटाना
यह दर्शाता है कि न्याय की देवी अब अपनी खुली आँखों से सबको समान दृष्टि से देखेंगी और निष्पक्ष न्याय करेंगी।
पहले, हमारी न्याय की देवी को अंग्रेजों ने रोमन और ग्रीस संस्कृति की वेशभूषा पहनाकर हमारे न्यायालयों पर थोप दिया था। परंतु अब भारत ने न्याय की देवी को भारतीय परिधानों में सुसज्जित किया है। न्याय की देवी अब श्वेत वस्त्रों और भारतीय परंपरा के अनुरूप बालों की सज्जा के साथ प्रस्तुत की गई हैं। यह नया स्वरूप न केवल भारत की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है, बल्कि हमारी स्वतंत्रता और स्वाभिमान का भी प्रतीक है।
इस प्रतिमा में एक और बड़ा परिवर्तन यह है कि अब न्याय की देवी के हाथ में तलवार नहीं,
बल्कि संविधान है। यह दिखाता है कि अदालतें दंड देने के लिए नहीं, बल्कि संविधान का पालन कराने और
न्याय प्रदान करने के लिए हैं। यह परिवर्तन न्याय की पारदर्शिता और भारतीय संस्कृति की ऊँची सोच को स्पष्ट करता है।
सच में, मेरा भारत अब बदल रहा है।
भारत अपनी सांस्कृतिक धरोहर की वैज्ञानिकता और व्यवहारिकता को अपनाकर एक जागृत भारत बनता जा रहा है।
जय हिंद!