मेघदूत के पात्रों का चरित्र-चित्रण

(क) यक्ष

•​ यक्ष मेघदूत खंडकाव्य का नायक है। महाकवि कालिदास ने यक्ष के पात्र का सृजन करके सहृदय

वियोगी के मनोभावों का जितना मार्मिक विश्लेषण किया है उतना अन्यत्र कहीं देखने को नहीं

मिलता।

•​ यक्ष एक देवयोनि-विशेष है। वह अपने स्वामी कुबेर की पूजा-अर्चना के निमित्त लाए जाने वाले पुष्पों

को न लाने के कारण क्रोधित कुबेर द्वारा शापित है। प्रिया के साथ रमण में वह इतना लीन हो

गया था कि स्वामी द्वारा दिए गए कर्तव्य का भी भान न रहा।

•​ यक्ष एकपत्नी व्रत धारण किए हुए है। प्रिया के प्रति ईमानदार है। वियोग की स्थिति में भी वह

निरंतर अपनी पत्नी यक्षिणी को याद करके अपने दिन व्यतीत कर रहा है। उसके वियोग से निरंतर

विकल रहता है।

•​ खंडकाव्य का नायक यक्ष बहुत अधिक व्यवहारपटु भी है। वह मेघ को विभिन्न मार्गों पर होने वाली

क्रियाओं तथा उनकी प्रतिक्रियाओं तथा कैसे वहाँ पर व्यवहार करना है इन सबका ज्ञान देता है।

•​ मेघदूत का यक्ष कुशल भूगोलवेत्ता, इतिहासवेत्ता भी है। उसने रामगिरि से अलकापुरी तक के मार्ग का

अत्यंत सटीक वर्णन किया है जो आज के परिप्रेक्ष्य में भी एकदम सही है। साथ ही विभिन्न प्रसंगों

में पौराणिक-ऐतिहासिक संदर्भों का भी उल्लेख करता है।

यक्ष शिव-भक्त भी है

•​ यक्ष शिव-भक्त भी है। उज्जयिनी के वर्णन के प्रसंग में यक्ष से विशेष आग्रह है कि यदि सायंकाल

की आरती से पहले उज्जयिनी पहुँच जाएँ तो कुछ देर विश्राम करके सायंकाल की आरती में

उपस्थित होकर ही आगे बढ़ें।

•​ यक्ष विविध गुणों से युक्त है – स्वामिभक्त, प्रकृतिप्रिय, रहस्यज्ञाता, करुण-प्रवृत्ति, विलास-प्रिय,

रति-कुशल तथा प्रकृति-रूपण में भी दक्ष है।

•​ यक्ष अत्यंत उत्कंठित विरह-व्याकुल है। वह निरंतर अपनी पत्नी की स्मृति से व्याकुल है। मेघ को

दूत बनाने का विचार उसकी असहनीय विरह-वेदना का परिणाम है।

•​ एक जड़ वस्तु से दीनता में प्रार्थना कर उठना ही उसके शोक का उच्च शिखर है, जिसमें उसे

जड़-चेतन का भी भान नहीं रहता। मेघदूत खंडकाव्य का यक्ष कर्तव्यच्युत प्रवृत्ति का है।

(ख) यक्षिणी

•​ मेघदूत खंडकाव्य की नायिका यक्षिणी अपने पति की प्रिया है तथा उसका निवास अलकापुरी में है।

शाप के कारण यक्ष एक वर्ष की अवधि के लिए अपनी प्रिया से दूर है।

•​ यक्षिणी पूर्ण पतिव्रता है। पति के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष का मन में भी ध्यान नहीं करती है।

पति के वियोग में उसने साज-सज्जा, केश-विन्यासादि सभी शृंगार त्याग दिए हैं।

•​ कुबेर द्वारा दिए गए शाप के कारण वह पति को जाने से नहीं रोकती है तथा स्वामी की आज्ञा का

पालन न करने के कारण मिले दंड में स्वयं भी भागी बनती हुई कष्ट को भोग रही है।

•​ यक्षिणी अपूर्व सौंदर्यशालिनी है जिसका वर्णन यक्ष ने किया है – ‘तन्वी श्यामा शिखरिदशना

पक्विबिम्बाधरोष्ठी / मध्ये क्षामा चकितहरिणीप्रेक्षणा निम्ननाभिः / श्रोणीभाराद् अलसगमना

स्तोकनम्रा स्तनाभ्यां / या तत्र स्याद् युवतिविषये सृष्टिराद्येव धातुः।।’ यह ब्रह्मा की सृष्टि की

प्रारंभिक उत्कृष्ट रचना है।

यक्षिणी विरह

•​ यक्षिणी विरह से अत्यधिक व्याकुल है। शरीर कृशकाय हो गया है, मुख विवर्णत्व को प्राप्त हो गया

है तथा समय-समय पर कृशता के कारण मूर्छा को प्राप्त करती रहती है। यक्षिणी एक मुग्धा

नायिका है।

•​ अलकापुरी गन्धर्व की नगरी होने के कारण सुख-समृद्धि तथा ललित कलाओं में समृद्ध है। अतः

यक्षिणी भी संगीत कला में अत्यधिक निपुण है। यक्ष के कथन के अनुसार यद्यपि यक्षिणी संगीत

कला में अतिनिपुण है, फिर भी विरह के कारण उसका स्वर किंचित् शिथिल हो गया है।

•​ मेघदूत की यक्षिणी शापावधि में पति के वियोग में साज-सज्जा, आभूषण आदि का त्याग करके

योगिनी की भाँति अपने जीवन का यापन कर रही है। साथ ही धैर्य के साथ अपने पति यक्ष की

प्रतीक्षा में रत रहकर अपने स्वामी की आज्ञा का पालन कर रही है।

•​ इस प्रकार वह एक स्वामिभक्त, पतिव्रता, दृढ़प्रतिज्ञ नारी है। यक्षिणी कुबेर द्वारा दिए गए शाप के

दंड को समभाव से भोगते हुए पति के वापस लौटने की प्रतीक्षा करती है।

(ग) मेघ

•​ समस्त सृष्टि के पालनहार मेघ इस मेघदूत नामक खंडकाव्य के भी आधार हैं। यक्ष में जीवन की

आशा का संचार करने वाले हैं। इस खंडकाव्य में मेघ को दूत बनाया गया है, यह नामकरण ही मेघ

की उपादेयता को सिद्ध करता है।

•​ महाकवि कालिदास के अनुसार यह मेघ पुष्कर वंश में उत्पन्न उच्च संस्कारों से युक्त है। साथ ही

एक अनुकूलतम संदेशवाहक है। मेघ हमेशा से ही लोकप्रिय रहे हैं चाहे उनको देखकर प्राणियों को

होने वाली प्रसन्नता हो या फिर सहयोगी के वियोग में उनको देखकर होने वाली उत्कंठा।

•​ मेघ सभी के द्वारा पूज्य है, स्तुत्य है। पर्वत भी उसे सिर पर धारण करते हैं – ‘त्वाम्

आसारप्रशमितवनोपप्लवं साधु मूर्ध्ना वक्ष्यत्यध्वश्रमपरिगतं सानुमानम्रकूटः।’ लोक में भी देखा जाता

मेघ का आना शुभ शकुन माना जाता है।

•​ यह एक अच्छा श्रोता तथा धैर्यवान है। इस प्रकार मेघदूत का मेघ दूतकार्य के लिए परम विश्वसनीय

तथा सर्वतः उपयुक्त है।

•​ मेघ इस सांसार में सभी का नियामक है फिर वह चाहे अन्न की उत्पत्ति हो या फिर किसी वियोगी

के संदेश का वाहकत्व। मेघदूत खंडकाव्य में मेघ की स्तुति बहुधा की गई है।

•​ मेघ ‘पुष्करावर्तकानां’ वंश में जन्मे उच्च संस्कारों से युक्त हैं – ‘जातं वंशे भुवनविदिते

पुष्करावर्तकानां जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः।’ यक्ष इसे इंद्र का प्रधान पुरुष भी जानता

है।

•​ जो भी मेघ की शरण में आता है वे उन्मुक्त होकर उनका स्वागत करते हैं तथा उनकी सहायता

करते हैं। मेघ कामाकांक्षाओं को पूर्ण करने वाले माने जाते हैं।


( मेघदूत के पात्रों का चरित्र-चित्रण )


Leave a Comment