मेघदूत का वैशिष्ट्य
• मेघदूत संस्कृत साहित्य में पहले खंडकाव्य के रूप में अपना विशेष स्थान रखता है। यह लघु काव्य
है जिसमें कुल 115 श्लोक हैं (पूर्वमेघ में 63 और उत्तरमेघ में 52), इसके अतिरिक्त 5 अन्य
प्रक्षिप्त श्लोक भी हैं।
• मेघदूत का प्रमुख रस विप्रलंभ शृंगार है, क्योंकि इसमें विरह-व्याकुल यक्ष-यक्षिणी की काम-दशाओं
का सजीव चित्रण किया गया है। विप्रलंभ शृंगार के वर्णन में महाकवि कालिदास पूर्ण पटु हैं।
• सम्पूर्ण मेघदूत में मंदाक्रांता छंद का प्रयोग किया गया है। इसका लक्षण है –
‘मंदाक्रांताऽम्बुधिरसनगैर्मो भनौ तौ गयुग्मम्।’ यह छंद अपनी गेयात्मकता के लिए प्रसिद्ध है, अतः
इसका प्रयोग शृंगार रस के वर्णन में अधिक प्रभावोत्पादक होता है।
• अलंकार – ‘अलंकुर्वंतीति अलंकाराः’ – कालिदास ने मेघदूत में यथाप्रसंग विविध अलंकारों का प्रयोग
किया है। उपमा, अर्थान्तरन्यास, उत्प्रेक्षा, अप्रस्तुतप्रशंसा, स्वाभावोक्ति, रूपक, विशेषोक्ति,
काव्यलिंग, समासोक्ति, दृष्टांत, अनुमान, अतिशयोक्ति आदि का सुंदर प्रयोग हुआ है।
• कवि कालिदास को अनुप्रास के साथ-साथ उपमा तथा अर्थान्तरन्यास के प्रयोग में सर्वाधिक सफलता
प्राप्त हुई है, इसीलिए उन्हें ‘उपमा सम्राट’ स्वीकार किया जाता है।
शैली
• शैली – कालिदास ने मेघदूत में वैदर्भी शैली का प्रयोग किया है। आचार्य दण्डी ने ‘तेनेदं वर्त्म वैदर्भं
कालिदासेन शोधितम्’ कहकर वैदर्भी रीति के प्रति कालिदास के विशेष प्रयोग-बाहुल्य को दर्शाया है।
• साहित्यदर्पण के अनुसार वैदर्भी रीति की विशेषता है – ‘माधुर्यव्यञ्जकैर्वर्णैः रचना ललितात्मिका।
अवृत्तिरल्पवृत्तिर्वा वैदर्भी रीतिरिष्यते।’ मेघदूत की भाषा ललित, स्वाभाविक एवं अत्यंत सरल है।
• मेघदूत की 50 से अधिक संस्कृत व्याख्याएँ अब तक हो चुकी हैं। साथ ही विश्व की अनेक भाषाओं
में इसका गद्य और पद्य दोनों रूपों में अनुवाद हुआ है।
• मेघदूत से प्रेरणा लेकर अनेक कवियों ने दूतकाव्य और संदेशकाव्य की रचना की। एक आदर्श
खंडकाव्य/गीतिकाव्य के जितने भी नियम निर्धारित किए गए हैं, मेघदूत उन सभी कसौटियों पर
खरा उतरता है।
• मेघदूत का नामकरण ही अपने आप में एक चमत्कार है। शीर्षक का अध्ययन मात्र करने से ही
सहृदय पाठक में उत्कंठा हो जाती है।
( मेघदूत का वैशिष्ट्य )