मेघदूत का कथानक
• मेघदूत एक खंडकाव्य है जो मंदाक्रांता छंद में निबद्ध है। यह संस्कृत साहित्य का पहला और
एकमात्र ऐसा खंडकाव्य है जिसमें मेघ को दूत बनाया गया है।
• कुबेर के एक यक्ष-सेवक ने प्रिया के प्रति अत्यधिक अनुराग के कारण अपने स्वामी द्वारा सौंपे गए
कर्तव्य (ताज़े पुष्प लाना) में प्रमाद किया, जिससे कुबेर ने कुपित होकर उसे एक वर्ष के लिए प्रिया
से दूर रहने का शाप दिया।
• शापित यक्ष कुबेर की आज्ञा से विंध्याचल में रामगिरि पर्वत के आश्रमों में निवास करने लगा, जहाँ
सीता द्वारा किए गए स्नान से पवित्र जल और घने छायादार वृक्ष थे।
• आषाढ़ मास के प्रथम दिन यक्ष ने रामगिरि की चोटी पर घुमड़ते हुए एक मेघ को देखा। मेघ को
देखते ही उसका हृदय करुणा से द्रवित हो गया क्योंकि जो मेघ सुखी मनुष्य को भी विकारयुक्त कर
देता है, उस विरही यक्ष का तो कहना ही क्या।
यक्ष ने चमेली
• यक्ष ने चमेली के ताजे फूलों से अर्घ्य तैयार कर मेघ का ‘स्वागत’ कहकर उसे दूत बनाने की प्रार्थना
की। यक्ष मेघ को ‘पयोद’ (जलदाता) और ‘जलधर’ आदि नामों से संबोधित करता है।
• पूर्वमेघ में यक्ष मेघ को रामगिरि से अलकापुरी तक का मार्ग बताता है – मालव देश, आम्रकूट पर्वत,
नर्मदा नदी, दशार्ण देश, विदिशा नगरी, उज्जयिनी, निर्विंध्या नदी, सिंधु नदी, कुरुक्षेत्र, सरस्वती
नदी, गंगा, हिमालय और अंत में अलकापुरी।
• उत्तरमेघ में यक्ष अलकापुरी की भव्यता, अपने घर की पहचान, अपनी पत्नी यक्षिणी का रूप-वर्णन
और संदेश का वर्णन करता है। अलकापुरी देवों के कोषाध्यक्ष कुबेर की राजधानी है।
• यक्ष का संदेश है – ‘प्रिय! मैं प्रियंगु लताओं में तुम्हारे शरीर की, भयभीत हुई मृगियों की दृष्टि में
तुम्हारे चितवन की, चंद्रमा में तुम्हारे मुख-सौंदर्य की, मयूरों की पूँछों में तुम्हारे केश-पाश की और
नदियों की लहरों में तुम्हारे विलास की कल्पना करता रहता हूँ।’
• यक्ष मेघ से कहता है – ‘भाई! यह मेरा संदेश चाहे मित्रता के नाते बोलो, चाहे मुझ दुःखी के प्रति
दया के नाते बोलो।’ इस प्रकार यक्ष मेघ से निवेदन करता है।
• कालिदास के अनुसार इस कल्पना का आधार रामायण का हनुमत् अथवा महाभारत का हंस रहा
होगा। इसमें पति-पत्नी का विप्रलंभ-शृंगार पूर्ण रूप से स्पष्ट एवं सफल हुआ है।
( मेघदूत का कथानक )