पूर्ववमेघ – श्लोक 30-63 (उज्जयिनी एवं आगे का मार्गग)

• श्लोक 30 – यक्ष अवंती एवं उज्जयिनी का वर्णन करते हुए उनके गुणों का वर्णन करता है। ‘जहाँ ग्राम के

वृद्धजन उदयन की कथा के जानकार हैं, ऐसी अवंती नामक नगरी पहुँचकर, पुण्यफलों के क्षीण हो

जाने पर, बचे हुए पुण्यों से पृथ्वी पर स्वर्गवासियों द्वारा लाए गए एक स्वर्ग के देदीप्यमान खण्ड के

समान, जो पहले ही बताई जा चुकी है, ऐसी संपत्ति शालिनी नगरी उज्जयिनी को चले जाना।’

•​ श्लोक 31 – उज्जयिनी की शिप्रा नदी की वायु के गुणों का वर्णन – जहाँ उज्जयिनी में प्रातःकाल में

तीव्र एवं मद के कारण मधुर सारस पक्षियों की मीठी ध्वनि को बढ़ाता हुआ, पूर्ण रूप से खिले हुए

कमलों के सम्पर्क में आने से अत्यंत सुगंधित, अंगों का स्पर्श पाकर उन्हें सुख देने वाला शिप्रा नदी

का वायु स्त्रियों की संभोग-काल से होने वाली थकावट को दूर करती है।

•​ श्लोक

•​ श्लोक 32 – उज्जयिनी के वैभव का वर्णन करते हुए कवि कहते हैं कि उज्जयिनी के बाज़ारों में

विविध रत्न-मणियाँ, शंख, सीपियाँ आदि फैलाए हुए हैं, ऐसा दिखाई पड़ता है मानो सागर के सारे

रत्न यहाँ आ पहुँचे हों और समुद्रों में होने वाले इन रत्नों के इस उज्जयिनी में आ जाने से मानो

समुद्र में सिर्फ जलमात्र अवशिष्ट रह गया हो।

•​ श्लोक 33 – उज्जयिनी में स्थित महाकाल मंदिर को अवश्य जाना, ऐसा यक्ष का मेघ से कहना है।

जहाँ उज्जयिनी में त्रिलोक-स्वामी एवं पार्वती के पति (शिव) के पवित्र धाम (महाकाल) को जाना,

जहाँ के उद्यान गंधवती नदी से कमलपुष्पों के परागों को छूकर आने वाले एवं जलक्रीड़ा में युवतियों

द्वारा प्रयुक्त साधन (चंदनादि) से सुगंधित वायु द्वारा सदैव प्रकम्पित रहते हैं।

•​ श्लोक 34 – यक्ष मेघ से कहता है कि महाकाल मंदिर में किसी भी समय पहुँचकर तुम्हें तब तक

रुकना चाहिए जब तक सूर्य आँखों से ओझल न हो जाता, क्योंकि शिव की सायंकालीन पूजा के

समय नगाड़े का कार्य करता हुआ (तुम अपनी) गंभीर गर्जना का अवश्य ही सम्पूर्ण फल को प्राप्त

करोगे।

•​ श्लोक

•​ श्लोक 35 – महाकाल मंदिर की नर्तकियों का स्वरूप बताया गया है – वहाँ महाकाल मंदिर में

संध्याकाल में नर्तकियों द्वारा पैरों को थिरकाने से उनकी करधनियाँ बजती हैं, नर्तकियों द्वारा पहने

हुए रत्नों की कांति से विभूषित चँवरों को विलासता से हिलाने के कारण थके हुए हाथों वाली

नर्तकियों के शरीर में नखक्षत द्वारा हुए खरोंच पर जब तुम्हारी वर्षा की पहली बूँदें पड़ेंगी तो वे

नर्तकियाँ तुम पर भँवरपंक्ति के समान लम्बे-लम्बे कटाक्ष छोड़ेंगी।

•​ श्लोक 36 – महादेव के तांडव नृत्य में मेघ किस तरह सहायता करेगा यह यक्ष बताते हैं – तत्पश्चात्

भगवान् शिव के नृत्य के आरंभ में नवीन जपापुष्प के समान रक्तिम सन्ध्याकालीन कांति को

धारण करता हुआ उन्नत भुजारूपी वृक्षों के जंगल पर मण्डलाकार रूप से व्याप्त होकर, देवी पार्वती

द्वारा निर्भय नेत्रों से टकटकी लगाकर देखी गई भक्ति वाले (तुम महादेव की) हाथी के ताजे चर्म

(ओढ़ने) की इच्छा को दूर कर देना।

•​ श्लोक

•​ श्लोक 37 – यक्ष मेघ को उज्जयिनी में अभिसारिकाओं को अपने विद्युत-प्रकाश द्वारा मार्ग दिखाने

का निर्देश देता है – वहाँ रात्रि में प्रेमियों के घरों को जाती हुई वनिताओं को घोर अन्धकारवश न

दिखाई देने वाले राजमार्ग में कसौटी पर स्वर्ण-रेखा के समान आलोकित बिजली से भूमि दिखाना

एवं वर्षा का और गर्जन का शब्द न करना, क्योंकि वे (वनिताएँ) स्वभावतः डरपोक होती हैं।

•​ श्लोक 39 – यक्ष मेघ को कामिनियों के सौकर्य के लिए सूर्योदय के समय सूर्य का मार्ग छोड़ देने के

लिए कहता है। पूर्वार्ध में सूर्य का मार्ग न रोकने का हेतु है, पश्चात् उत्तरार्ध में कारण बताया गया है

– सूर्य कमलिनी के मुख से आँसू पोंछने के लिए आया हुआ है। यदि तुम सूर्य की किरण-रूपी हाथों

को रोकोगे तो वह तुम्हारे प्रति क्रोधित हो जाएगा।

•​ श्लोक 50 – यक्ष मेघ को कनखल के पास हिमालय से उतरी गंगा के पास जाने का निर्देश देता है।

गंगा रामा जहु की पुत्री है अतः उसका अपर नाम जाह्नवी भी है। गंगा हिमालय से उतरकर अपने

प्रिय कैलास की गोद में जाने से अपने स्थान से खिसकी हुई लहरें रूपी हाथों से भगवान् शिव के

बालों को पकड़ती हुई मानो पार्वती के क्रोधपूर्ण भ्रूभंगों का अपने सफेद झाग से उपहास करती हुई

प्रतीत होती है।

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