पूर्ववमेघ – श्लोक 1-29 (यक्ष का संदेश एवं मेघमार्गग)

•​ श्लोक 1 (प्रथम श्लोक) – वस्तुनिर्देशात्मक मंगलाचरण के रूप में यक्ष का परिचय दिया गया है।

यक्ष जो एक देवयोनि-विशेष है, वह अपने कर्तव्य से प्रमाद करने के कारण अर्थात् आलस्य करने के

कारण, एकवर्षीय शाप से पीड़ित होकर, जिसकी सारी शक्तियाँ नष्ट कर दी गई हैं – ऐसे किसी यक्ष

ने, जानकी (सीता) के द्वारा किए गए स्नान से पवित्र हुए जल वाले तथा घने और छायादार वृक्षों

से युक्त रामगिरि पर्वत के आश्रमों में निवास किया।

•​ श्लोक 2 – आषाढ़ मास के प्रथम दिन यक्ष ने पर्वत की चोटी पर व्याप्त, मिट्टी खोदने में तिरछे

दाँतों से प्रहार करते हुए हाथी के जैसे दिखने वाले, दर्शनीय मेघ को देखा।

•​ श्लोक 3 – मेघ को देखकर यक्ष विचार करता है कि बादल के दिखाई देने पर तो सुखी व्यक्ति का

भी चित्त भिन्न ही वृत्ति वाला हो जाता है और जब जिसे गले लगाने की अभिलाषा हो उस कांता के

दूर रहने पर तो कहना ही क्या।

•​ श्लोक 4 – यक्ष ने श्रावण मास के निकट आने पर अपनी पत्नी के जीवन के आलंबन की कामना

रखते हुए, उस मेघ द्वारा अपनी कुशलता के समाचार को पहुँचाने की अभिलाषा से, ताज़े खिले हुए

चमेली के फूलों से अर्घ्य की सामग्री तैयार की और प्रसन्न चित्त होकर उस मेघ को प्रेमपूर्वक शब्दों

में ‘स्वागतम्’ कहा।

•​ श्लोक 5 – यक्ष मेघ को संदेशवाहक बनाने का कारण स्पष्ट करता है। वह कहता है – कहाँ धुआँ,

प्रकाश, जल और वायु का मिश्रण मेघ, और कहाँ सक्षम इंद्रियों वाले प्राणियों द्वारा ले जाने योग्य

संदेश की बातें। किंतु काम से पीड़ित प्राणियों की प्रकृति चेतन-अचेतन के प्रति विवेकशून्य हो जाती

है।

​ श्लोक 6

•​ श्लोक 6 – यक्ष मेघ के कुल का वर्णन करते हुए उससे संदेश निर्वहन का कारण स्पष्ट करता है।

कहता है – ‘हे मेघ! तुम भुवनों में प्रसिद्ध पुष्कर और आवर्तक के कुल में जन्मे हो, अपनी

इच्छानुसार रूप भी धारण कर सकते हो, इंद्र के प्रधान पुरुष हो यह भी जानता हूँ। इसलिए

भाग्यवश दूर प्रेयसी वाला मैं (यक्ष) तुम्हारा याचक हुआ हूँ।’

•​ श्लोक 7 – यक्ष मेघ को संदेश के प्राप्ति-स्थल के बारे में बताता है। कहता है – ‘हे मेघ! तुम संतप्त

लोगों की शरण हो। कुबेर के क्रोध से वियुक्त हुए मेरे संदेश को मेरी प्रिया तक ले जाओ। तुम्हें

यक्षेश्वरों के बाहरी उद्यान में स्थित, शिव के सिर पर स्थित चन्द्रिका की चाँदनी से जहाँ के महल

प्रकाशमान हैं ऐसी अलका नामक नगरी में जाना है।’

•​ श्लोक 8 – मेघ को देखकर विरही जनों की स्थिति का वर्णन – जब तुम वायुमार्ग में चढ़े हुए होते

हो, परदेश गए हुए व्यक्तियों की स्त्रियाँ उनके घर वापस लौटने के विश्वास से अपने हाथ से बालों

के अग्रभाग को ऊपर किए हुए आशापूर्वक देखेंगी।

•​ श्लोक 9 – यक्ष मार्ग में होने वाले अनुकूल अनुभव का वर्णन करते हुए कहता है कि अनुकूल पवन

तुम्हें धीरे-धीरे ले जा रही है, यह चातक पक्षी तुम्हारे बायीं ओर मधुर शब्द कर रहा है, गर्भाधान के

क्षण के आनंद का अभ्यास होने से आकाश में पंक्तिबद्ध बगुलियाँ नयनों को सुंदर लगने वाले

तुम्हारी निश्चित रूप से सेवा करेंगी।

•​ श्लोक 10 – यक्ष मेघ को अपनी पत्नी की स्थिति बताते हुए कहता है कि दिनों की गणना में

तत्पर, जीवित (आशा में), पतिव्रता, उस भाई की पत्नी को विना रुके जाते हुए अवश्य देखोगे।

क्योंकि आशा का बंधन फूलों की तरह वियोग में शीघ्र ही टूटने वाले स्त्रियों के प्रेम से भरे हुए हृदय

को प्रायः रोके रखता है।

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