उत्तरमेघ – श्लोक 1-24 (अलकापुरी एवं यक्षिणी का वर्णणन)

•​ श्लोक 1 (उत्तरमेघ) – यक्ष द्वारा मेघ को अलकापुरी का मार्ग बताया जा रहा है। ‘जहाँ अलकापुरी में

सुंदर स्त्रियों वाले, चित्रों से युक्त, संगीत के लिए मृदंग बजाए गए, मणि आदि रत्नों से सुशोभित

भूमि वाले, आकाश तक छूते शिखरों से युक्त भवन, बिजली धारण करने वाले, इंद्रधनुष से युक्त,

मधुर और गंभीर गर्जन वाले, अपने अंदर जल धारण करने वाले और ऊँचे तुमसे उन-उन गुणों के

कारण बराबरी करने में सक्षम हैं।’

•​ श्लोक 2 – अलकापुरी की स्त्रियों के पुष्पालंकार का वर्णन – जहाँ अलकापुरी की स्त्रियों के हाथ में

क्रीड़ा के लिए धारण किया हुआ कमल पुष्प, बालों में नए कुंद पुष्पों का गुम्फन, मुख में लोध्र-पुष्पों

के कणों से शुभ्रता को प्राप्त, जूड़े में नवीन कुरबक के पुष्प, कानों में सुंदर चमकीले शिरीष पुष्प

और माँग में तुम्हारे आने से उत्पन्न होने वाला कदम्ब पुष्प सुशोभित होता है।

•​ श्लोक 3 – अलकापुरी में यक्षों के उपभोग का वर्णन – जहाँ अलकापुरी में यक्ष सुंदर स्त्रियों के साथ

मिलकर स्फटिक मणि से जड़ित (अतः) तारों के प्रतिबिंब रूपी पुष्पों से सुशोभित, महलों की

अटारियों पर जाकर तुम्हारे समान गंभीर ध्वनि वाले पुष्कर नामक बाजों और नगाड़ों के धीरे-धीरे

बजाए जाने पर, कल्पवृक्ष से उत्पन्न रतिफल नामक मदिरा का सेवन करते हैं।

•​ श्लोक 4 – अलकापुरी की कन्याओं की क्रीड़ा का वर्णन – जहाँ अलकापुरी में अपने आगमन के

कारण उत्पन्न होने वाले, देवताओं द्वारा माँगी गई सुंदरियाँ, गंगा नदी के जल की शीतलता से सेवा

की जाती हुई, किनारों पर उगे हुए मंदार वृक्षों की छाया से रोकी गई धूप वाली, सोने की बालू में

मुट्ठी में रखकर छिपाए गए, अतः खोजी जाने योग्य मणियों से खेलती हैं।

•​ श्लोक 7

•​ श्लोक 7 – अलकापुरी में स्त्रियों को होने वाली रतिजन्य थकावट चन्द्रकांत मणियों से दूर होती है –

जहाँ अलकापुरी में अर्धरात्रि में तुम्हारी रुकावट के हट जाने से निर्मल चन्द्रमा की किरणों के सम्पर्क

से स्वच्छ जलकण की बूँदों को टपकाने वाली झालरों में लटकती हुई चन्द्रकांत मणियाँ, प्रियतमों की

भुजाओं से ढीले पड़े आलिंगनों वाली स्त्रियों की रतिक्रीड़ा से उत्पन्न शारीरिक थकावट को दूर कर

देती हैं।

•​ श्लोक 9 – अलकापुरी में अभिसारिकाओं के रात्रि के मार्ग को जानते हो कैसे – सूर्योदय पर चलने में

हिलने के कारण बालों से गिरे हुए मंदार के फूलों से, कान से गिरे हुए पत्तों के खंडों से, स्वर्ण-कमलों

से, स्तन-प्रदेश पर टूटे हुए धागों वाली मोतियों की लड़ों से और पुष्पमालाओं से सूचित हो जाता है।

•​ श्लोक 10 – अलकापुरी में स्त्रियों का भ्रूभंग कामदेव के अस्त्रों के समान कार्य करता है – जहाँ

अलकापुरी में कामदेव कुबेर के मित्र महादेव शिव को प्रत्यक्ष रूप में रहता हुआ जानकर भय के

कारण भ्रमर-रूपी डोरी वाले धनुष को धारण नहीं करता है, क्योंकि उसका कार्य टेढ़ी भौंह करके

चलाए गए नेत्रों वाले, कामुक जन-रूपी निशानों पर सफल चतुर स्त्रियों के हाव-भाव से ही बन जाता

है।

•​ श्लोक 11

•​ श्लोक 11 – अलकापुरी में स्त्रियों की समस्त प्रसाधन सामग्री को कल्पवृक्ष प्रदान करता है –

अलकापुरी में अनेक रंगों के वस्त्रों को, नेत्रों को विलास सिखाने में समर्थ मदिरा को, नवपल्लवों के

साथ पुष्पों के विकास को, अनेक प्रकार के आभूषणों को तथा चरण-कमल के योग्य महावर आदि

स्त्रियों की संपूर्ण प्रसाधन सामग्री को अकेला कल्पवृक्ष ही उपलब्ध कराता है।

•​ श्लोक 12 – यक्ष मेघ को अपने घर की पहचान बताता है – वहाँ अलकापुरी में कुबेर के महल से

उत्तर की ओर हमारा घर है, इंद्रधनुष के समान सुंदर बाहरी द्वार से दूर से ही दिखाई देने वाला है,

जिसके पास मेरी प्रिया द्वारा पाला गया, गोद लिया पुत्र, हाथों से प्राप्त करने योग्य गुच्छों द्वारा

झुकाया गया छोटा-सा मंदार का वृक्ष है।

•​ श्लोक 19 – यक्ष अपनी प्रिया का रूप-वर्णन करता है – ‘वहाँ मेरे घर में कृश कायावाली,

नव-यौवनावाली, नुकीले दाँतों वाली, पके हुए बिंबफल के समान नीचे के ओष्ठ वाली, पतली कमर

वाली, डरी हुई हरिणी के सदृश दृष्टि वाली, गहरी नाभि वाली, नितंबों के भार के कारण मंदगति से

चलने वाली, स्तनों के कारण कुछ झुकी हुई – जो हो, युवतियों के विषय में ब्रह्मा की आदि सृष्टि

होगी।’



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