मेघदूत में रस, छंद, अलंकार एवं शैली
• रस – रस काव्य का आत्मभूत तत्व है। मेघदूत गीतिकाव्य का प्रधान रस विप्रलंभ शृंगार है। इसमें
विरह-व्याकुल यक्ष-यक्षिणी की काम-दशाओं का सजीव चित्रण किया गया है। कालिदास प्रायः सभी
रसों के प्रयोग में सिद्धहस्त थे।
• उत्तरमेघ के श्लोक 21 में विरहावस्था का वर्णन : ‘अधिक रोने से सूजे हुए नेत्रों वाला, लम्बी-लम्बी
साँसों की गर्मी के कारण कांतिहीन निचले ओष्ठ वाला, हाथ पर रखा हुआ, तथा लटकते हुए केशों के
कारण पुराना दिखने वाला’ – यह विरह-वर्णन विप्रलंभ शृंगार का सर्वोत्तम उदाहरण है।
• छंद – काव्य में रस-सिद्धि के लिए सुंदर शब्दार्थ-योजना के साथ-साथ छंद-योजना भी अत्यंत
आवश्यक है। मेघदूत में सर्वत्र मंदाक्रांता छंद का प्रयोग किया गया है।
• मंदाक्रांता छंद अपनी गेयात्मकता के लिए प्रसिद्ध है, अतः इस छंद का प्रयोग शृंगार रस के वर्णन
में अधिक प्रभावोत्पादक होता है। प्रथम श्लोक में मगण, भगण, नगण, तगण, तगण तथा दो गुरु
वर्ण हैं, साथ ही 4, 6, 7वें अक्षर पर यति (विराम) है।
अलंकार
• उपमा अलंकार – पूर्वमेघ श्लोक 19 में विंध्य पर्वत की ऊबड़-खाबड़ तलहटी में बिखरी नर्मदा नदी को
हाथी के शरीर पर बनी रेखाओं की चित्रकारी के समान बताया गया है – यह उपमा अलंकार का
उत्कृष्ट उदाहरण है।
• उत्प्रेक्षा अलंकार – पूर्वमेघ श्लोक 25 में ‘पुलकितमिव’ क्रियापद के साथ ‘इव’ का प्रयोग करके
सम्भावना व्यक्त की गई है, जिससे उत्प्रेक्षा अलंकार स्पष्ट है।
• काव्यलिंग अलंकार – पूर्वमेघ श्लोक 39 में सूर्य का मार्ग न रोकने का हेतु स्पष्ट किया गया है।
जहाँ हेतु उक्त हो उसे काव्यलिंग (हेत्वलंकार) कहते हैं।
• श्लेष अलंकार – ‘करोरुधि’ शब्द के ‘कर’ का अर्थ हाथ और किरण दोनों होने से पूर्वमेघ श्लोक 39 में
श्लेष अलंकार भी है।
• समासोक्ति अलंकार – पूर्वमेघ श्लोक 39 में सूर्य पर नायक तथा कमलिनी पर नायिका का आरोप
होने के कारण समासोक्ति अलंकार है।
• वैदर्भी शैली की विशेषता यह है कि इसमें माधुर्य व्यंजक वर्ण रहें और वृत्ति न हो अथवा हो तो अति
लघु हो। कालिदास की सभी रचनाओं में ललित परिष्कृत प्रसाद-गुण पूर्ण शैली ही अधिक प्राप्त होती है।
( मेघदूत में रस, छंद, अलंकार एवं शैली )